अयोध्याकाण्ड · दोहा 187 · दोहा/सोरठा
सौंपि नगर सुचि सेवकनि सादर सकल चलाइ।
सौंपि नगर सुचि सेवकनि सादर सकल चलाइ।
सुमिरि राम सिय चरन तब चले भरत दोउ भाइ।।187।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.187 · पुस्तक पृ. 498, 498
भावार्थ और शब्दार्थ
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1सौंपि नगर सुचि सेवकनि सादर सकल चलाइ।
नगर को विश्वसनीय सेवकों के सुपुर्द करके और सबको आदरपूर्वक रवाना करके—
English explanation
Having entrusted the city to trustworthy servants and respectfully sent everyone on their way—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सौंपि | सौंपकर | having entrusted |
| नगर | नगर को | the city |
| सुचि | शुद्ध आचरण वाले; विश्वसनीय | upright; trustworthy |
| सेवकनि | सेवकों को | to servants |
| सादर | आदरपूर्वक | respectfully |
| सकल | सबको | everyone |
| चलाइ | रवाना करके | having sent off |
2 सुमिरि राम सिय चरन तब चले भरत दोउ भाइ।।187।।
तब राम और सीता के चरणों का स्मरण करके भरत और शत्रुघ्न, दोनों भाई, चले।
English explanation
Then, remembering the feet of Rama and Sita, the two brothers Bharata and Shatrughna set out.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुमिरि | स्मरण करके | having remembered |
| राम | राम के | of Rama |
| सिय | सीता के | of Sita |
| चरन | चरणों का | the feet |
| तब | तब | then |
| चले | चले | set out |
| भरत | भरत, राम के भाई | Bharata, Rama's brother |
| दोउ | दोनों | both |
| भाइ | भाई | brothers |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 187
- स्रोत अभिलेख
- 2.187
- सहायक विषय
- अयोध्यावासियोंसहित श्रीभरत-शत्रुघ्न आदिका वनगमन
- मुद्रित पृष्ठ
- 498, 498
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