अयोध्याकाण्ड · दोहा 186 · दोहा/सोरठा
आरत जननी जानि सब भरत सनेह सुजान।
आरत जननी जानि सब भरत सनेह सुजान।
कहेउ बनावन पालकीं सजन सुखासन जान।।186।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.186 · पुस्तक पृ. 497, 498
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1आरत जननी जानि सब भरत सनेह सुजान।
स्नेहशील और समझदार भरत ने सभी माताओं को व्याकुल जानकर—
English explanation
Affectionate and discerning Bharata, knowing that all the mothers were distressed—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| आरत | व्याकुल; दुखी | distressed |
| जननी | माताओं को | the mothers |
| जानि | जानकर | knowing |
| सब | सभी | all |
| भरत | राम के भाई भरत | Bharata, Rama’s brother |
| सनेह | स्नेहशील | affectionate |
| सुजान | समझदार; विवेकशील | discerning; wise |
2 कहेउ बनावन पालकीं सजन सुखासन जान।।186।।
पालकियाँ बनवाने और आरामदायक सवारियाँ सजाने को कहा।
English explanation
He ordered palanquins to be made ready and comfortable conveyances to be fitted out.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कहेउ | कहा; आदेश दिया | said; ordered |
| बनावन | बनवाने; तैयार करवाने को | to have made ready |
| पालकीं | पालकियाँ | palanquins |
| सजन | सजाने; तैयार करने को | to fit out; prepare |
| सुखासन | आरामदायक आसन वाली | with comfortable seats |
| जान | सवारियाँ; वाहन | conveyances; vehicles |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 186
- स्रोत अभिलेख
- 2.186
- सहायक विषय
- अयोध्यावासियोंसहित श्रीभरत-शत्रुघ्न आदिका वनगमन
- मुद्रित पृष्ठ
- 497, 498
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