अयोध्याकाण्ड · दोहा 185 · दोहा/सोरठा
जरउ सो संपति सदन सुखु सुहद मातु पितु भाइ।
जरउ सो संपति सदन सुखु सुहद मातु पितु भाइ।
सनमुख होत जो राम पद करै न सहस सहाइ।।185।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.185 · पुस्तक पृ. 496, 497
भावार्थ और शब्दार्थ
1जरउ सो संपति सदन सुखु सुहद मातु पितु भाइ।
वह संपत्ति, घर, सुख, सुहृद, माता, पिता और भाई जल जाएँ—जो राम के चरणों की ओर उन्मुख होने में भरपूर सहायता न करें।
English explanation
May wealth, home, comforts, friends, mother, father, and brother perish if they do not fully help one turn toward Rama’s feet.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जरउ | जल जाए; नष्ट हो जाए | may it burn; may it perish |
| सो | वह | that |
| संपति | संपत्ति | wealth |
| सदन | घर | home |
| सुखु | सुख | comforts |
| सुहद | मित्र; हितैषी | friends; well-wishers |
| मातु | माता | mother |
| पितु | पिता | father |
| भाइ | भाई | brother |
2 सनमुख होत जो राम पद करै न सहस सहाइ।।185।।
जो राम के चरणों की ओर उन्मुख होते समय हजार गुना, अर्थात भरपूर, सहायता न करें।
English explanation
If they do not give thousandfold—that is, abundant—help in turning toward Rama’s feet.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सनमुख | अभिमुख; ओर उन्मुख | turned toward |
| होत | होते समय | when becoming |
| जो | जो | which; those that |
| राम | भगवान राम के | of Lord Rama |
| पद | चरण | feet |
| करै | करें | provide |
| न | नहीं | not |
| सहस | हजार गुना; भरपूर | thousandfold; abundantly |
| सहाइ | सहायता | help |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 185
- स्रोत अभिलेख
- 2.185
- सहायक विषय
- अयोध्यावासियोंसहित श्रीभरत-शत्रुघ्न आदिका वनगमन
- मुद्रित पृष्ठ
- 496, 497
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।