अयोध्याकाण्ड · दोहा 184 · दोहा/सोरठा
अवसि चलिअ बन रामु जहँ भरत मंत्रु भल कीन्ह।
अवसि चलिअ बन रामु जहँ भरत मंत्रु भल कीन्ह।
सोक सिंधु बूड़त सबहि तुम्ह अवलंबनु दीन्ह।।184।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.184 · पुस्तक पृ. 495, 496
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1अवसि चलिअ बन रामु जहँ भरत मंत्रु भल कीन्ह।
अवश्य उस वन में चलें जहाँ राम हैं। भरत, तुमने अच्छी सलाह दी है।
English explanation
Let us certainly go to the forest where Rama is. Bharata, you have offered good counsel.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अवसि | अवश्य | certainly |
| चलिअ | चलें | let us go |
| बन | वन में | to the forest |
| रामु | राम हैं | Rama is |
| जहँ | जहाँ | where |
| भरत | हे भरत | Bharata |
| मंत्रु | सलाह | counsel |
| भल | अच्छी | good |
| कीन्ह | दी; प्रस्तुत की | gave; offered |
2 सोक सिंधु बूड़त सबहि तुम्ह अवलंबनु दीन्ह।।184।।
शोक के समुद्र में डूबते हुए सभी लोगों को तुमने सहारा दिया।
English explanation
You have given support to everyone drowning in the ocean of grief.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सोक | शोक के | of grief |
| सिंधु | समुद्र में | in the ocean |
| बूड़त | डूबते हुए | drowning |
| सबहि | सभी को | to everyone |
| तुम्ह | तुमने | you |
| अवलंबनु | सहारा | support |
| दीन्ह | दिया | gave |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 184
- स्रोत अभिलेख
- 2.184
- सहायक विषय
- वसिष्ठ-भरत-संवाद, श्रीरामजीको लानेके लिये चित्रकूट जानेकी तैयारी
- मुद्रित पृष्ठ
- 495, 496
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।