अयोध्याकाण्ड · दोहा 183 · दोहा/सोरठा
जद्यपि जनमु कुमातु तें मैं सठु सदा सदोस।
जद्यपि जनमु कुमातु तें मैं सठु सदा सदोस।
आपन जानि न त्यागिहहिं मोहि रघुबीर भरोस।।183।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.183 · पुस्तक पृ. 495, 495
भावार्थ और शब्दार्थ
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1जद्यपि जनमु कुमातु तें मैं सठु सदा सदोस।
यद्यपि मेरा जन्म बुरी माता से हुआ है और मैं मूर्ख तथा सदा दोषों से भरा हूँ,
English explanation
Although I was born of a bad mother and am foolish and ever full of faults,
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जद्यपि | यद्यपि | although |
| जनमु | जन्म | birth |
| कुमातु | बुरी माता | a bad mother |
| तें | से | from; of |
| मैं | मैं | I |
| सठु | मूर्ख | foolish |
| सदा | सदा | always |
| सदोस | दोषों से युक्त | full of faults |
2 आपन जानि न त्यागिहहिं मोहि रघुबीर भरोस।।183।।
मुझे भरोसा है कि रघुवीर राम मुझे अपना जानकर त्यागेंगे नहीं।
English explanation
I trust that Rama, the hero of Raghu’s lineage, will regard me as his own and not abandon me.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| आपन | अपना | his own |
| जानि | जानकर | regarding as |
| न | नहीं | not |
| त्यागिहहिं | वे त्यागेंगे | he will abandon |
| मोहि | मुझे | me |
| रघुबीर | रघुकुल के वीर राम | Rama, hero of Raghu’s lineage |
| भरोस | भरोसा है | I have trust |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 183
- स्रोत अभिलेख
- 2.183
- सहायक विषय
- वसिष्ठ-भरत-संवाद, श्रीरामजीको लानेके लिये चित्रकूट जानेकी तैयारी
- मुद्रित पृष्ठ
- 495, 495
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