अयोध्याकाण्ड · दोहा 182 · दोहा/सोरठा
आपनि दारुन दीनता कहउँ सबहि सिरु नाइ।
आपनि दारुन दीनता कहउँ सबहि सिरु नाइ।
देखें बिनु रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाइ।।182।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.182 · पुस्तक पृ. 494, 495
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1आपनि दारुन दीनता कहउँ सबहि सिरु नाइ।
सबको सिर झुकाकर मैं अपनी दारुण दीन दशा कहता हूँ।
English explanation
Bowing my head to everyone, I speak of my grievously wretched condition.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| आपनि | अपनी | my own |
| दारुन | भयंकर | grievous |
| दीनता | दीन दशा | wretched condition |
| कहउँ | कहता हूँ | I describe |
| सबहि | सबको | to everyone |
| सिरु | सिर | my head |
| नाइ | झुकाकर | bowing |
2 देखें बिनु रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाइ।।182।।
रघुनाथ के चरणों के दर्शन बिना मेरे हृदय की जलन नहीं मिटती।
English explanation
Without beholding Rama's feet, the burning anguish in my heart cannot subside.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| देखें | दर्शन किए | beholding |
| बिनु | बिना | without |
| रघुनाथ | रघुनाथ राम के | of Rama, lord of Raghu's line |
| पद | चरण | the feet |
| जिय | हृदय | the heart |
| कै | की | of |
| जरनि | जलन | burning anguish |
| न | नहीं | not |
| जाइ | मिटती | subsides |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 182
- स्रोत अभिलेख
- 2.182
- सहायक विषय
- वसिष्ठ-भरत-संवाद, श्रीरामजीको लानेके लिये चित्रकूट जानेकी तैयारी
- मुद्रित पृष्ठ
- 494, 495
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