अयोध्याकाण्ड · दोहा 181 · दोहा/सोरठा
राम मातु सुठि सरलचित मो पर प्रेमु बिसेषि।
राम मातु सुठि सरलचित मो पर प्रेमु बिसेषि।
कहइ सुभाय सनेह बस मोरि दीनता देखि।।181।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.181 · पुस्तक पृ. 493, 494
भावार्थ और शब्दार्थ
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1राम मातु सुठि सरलचित मो पर प्रेमु बिसेषि।
राम की माता अत्यंत सरल हृदय हैं और मुझ पर उनका विशेष प्रेम है।
English explanation
Rama’s mother is exceedingly simple-hearted and has special affection for me.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| राम | राम की | Rama’s |
| मातु | माता, कौसल्या | mother, Kausalya |
| सुठि | अत्यंत | exceedingly |
| सरलचित | सरल हृदय वाली | simple-hearted; guileless |
| मो | मुझ | me |
| पर | पर | toward |
| प्रेमु | प्रेम | affection |
| बिसेषि | विशेष; अधिक | special; especially strong |
2 कहइ सुभाय सनेह बस मोरि दीनता देखि।।181।
मेरी दीन दशा देखकर वे सहज स्नेह के वश में ऐसा कहती हैं।
English explanation
Seeing my distressed condition, she speaks this way under the influence of her natural affection.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कहइ | वे कहती हैं | she says |
| सुभाय | स्वभावतः; सहज | naturally; innate |
| सनेह | स्नेह | affection |
| बस | के वश में | under the influence of |
| मोरि | मेरी | my |
| दीनता | दीन दशा; व्याकुलता | distressed, pitiable condition |
| देखि | देखकर | seeing |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 181
- स्रोत अभिलेख
- 2.181
- सहायक विषय
- वसिष्ठ-भरत-संवाद, श्रीरामजीको लानेके लिये चित्रकूट जानेकी तैयारी
- मुद्रित पृष्ठ
- 493, 494
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