अयोध्याकाण्ड · दोहा 172 · दोहा/सोरठा
सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग।
सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग।
सोचिअ जति प्रंपच रत बिगत बिबेक बिराग।।172।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.172 · पुस्तक पृ. 486, 486
भावार्थ और शब्दार्थ
1सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग।
उस गृहस्थ के लिए शोक करना चाहिए जो मोह के वश में होकर कर्तव्य के मार्ग का त्याग करता है।
English explanation
One should lament the householder who, under the sway of attachment, abandons the path of duty.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सोचिअ | शोक करना चाहिए | one should lament |
| गृही | गृहस्थ | the householder |
| जो | जो | who |
| मोह | मोह के | of delusive attachment |
| बस | वश में | under the sway |
| करइ | करता है | performs |
| करम | कर्तव्य का | of duty |
| पथ | मार्ग | the path |
| त्याग | त्याग | abandonment |
2 सोचिअ जति प्रंपच रत बिगत बिबेक बिराग।।172।।
उस संन्यासी के लिए शोक करना चाहिए जो सांसारिक प्रपंच में लगा है और विवेक तथा वैराग्य से रहित है।
English explanation
One should lament the renunciant who is engrossed in worldly entanglements and lacks discernment and detachment.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सोचिअ | शोक करना चाहिए | one should lament |
| जति | संन्यासी | a renunciant |
| प्रंपच | सांसारिक प्रपंच में | in worldly entanglements |
| रत | लगा हुआ | engrossed |
| बिगत | से रहित | devoid of |
| बिबेक | विवेक | discernment |
| बिराग | वैराग्य | detachment |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 172
- स्रोत अभिलेख
- 2.172
- सहायक विषय
- वसिष्ठ-भरत-संवाद, श्रीरामजीको लानेके लिये चित्रकूट जानेकी तैयारी
- मुद्रित पृष्ठ
- 486, 486
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।