अयोध्याकाण्ड · दोहा 171 · दोहा/सोरठा
सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ।
सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ।
हानि लाभु जीवन मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ।।171।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.171 · पुस्तक पृ. 485, 486
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ।
मुनिश्रेष्ठ ने बिलखते हुए कहा, ‘भरत, सुनो, होनहार बड़ी प्रबल है।’
English explanation
Weeping, the chief sage said, ‘Listen, Bharata: destiny is powerful.’
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुनहु | सुनो | listen |
| भरत | हे भरत | O Bharata |
| भावी | होनहार; नियति | destiny; what is destined to happen |
| प्रबल | बलवान है | is powerful |
| बिलखि | बिलखते हुए | weeping |
| कहेउ | कहा | said |
| मुनिनाथ | मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ ने | Vasistha, chief among sages |
2 हानि लाभु जीवन मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ।।171।।
हानि और लाभ, जीवन और मृत्यु, यश और अपयश—ये सब विधाता के हाथ में हैं।
English explanation
Loss and gain, life and death, fame and disgrace—all are in the Creator's hands.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| हानि | हानि | loss |
| लाभु | लाभ | gain |
| जीवन | जीवन | life |
| मरनु | मृत्यु | death |
| जसु | यश | fame; good repute |
| अपजसु | अपयश | disgrace; ill repute |
| बिधि | विधाता के | of the Creator |
| हाथ | हाथ में हैं | are in the hands |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 171
- स्रोत अभिलेख
- 2.171
- सहायक विषय
- वसिष्ठ-भरत-संवाद, श्रीरामजीको लानेके लिये चित्रकूट जानेकी तैयारी
- मुद्रित पृष्ठ
- 485, 486
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।