अयोध्याकाण्ड · दोहा 170 · दोहा/सोरठा
सिंघासन भूषन बसन अन्न धरनि धन धाम।
सिंघासन भूषन बसन अन्न धरनि धन धाम।
दिए भरत लहि भूमिसुर भे परिपूरन काम।।170।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.17 · पुस्तक पृ. 484, 485
भावार्थ और शब्दार्थ
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1सिंघासन भूषन बसन अन्न धरनि धन धाम।
सिंहासन, आभूषण, वस्त्र, अन्न, भूमि, धन और भवन भी दान में दिए गए।
English explanation
Thrones, ornaments, clothing, grain, land, wealth, and residences were also given as gifts.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सिंघासन | सिंहासन | thrones |
| भूषन | आभूषण | ornaments |
| बसन | वस्त्र | clothing |
| अन्न | अन्न | grain and food |
| धरनि | भूमि | land |
| धन | धन-संपत्ति | wealth |
| धाम | भवन | residences |
2 दिए भरत लहि भूमिसुर भे परिपूरन काम।।170।।
ये सब भरत ने दिए; इन्हें प्राप्त करके ब्राह्मणों की इच्छाएँ पूरी हो गईं।
English explanation
Bharata gave these gifts; receiving them, the Brahmins had their wishes fully satisfied.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| दिए | दान में दिए | gave as gifts |
| भरत | भरत ने | Bharata |
| लहि | प्राप्त करके | having received |
| भूमिसुर | ब्राह्मण | the Brahmins |
| भे | हो गए | became |
| परिपूरन | पूर्णतः पूरी हुई | fully fulfilled |
| काम | इच्छाओं वाले | with their wishes satisfied |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 170
- स्रोत अभिलेख
- 2.17
- सहायक विषय
- वसिष्ठ-भरत-संवाद, श्रीरामजीको लानेके लिये चित्रकूट जानेकी तैयारी
- मुद्रित पृष्ठ
- 484, 485
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