अयोध्याकाण्ड · दोहा 306 · दोहा/सोरठा
सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ।
सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ।
तुलसी प्रीति कि रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ।।306।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.306 · पुस्तक पृ. 600, 600
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ।
सेवक हाथ, पैर और आँखों जैसे हों, और स्वामी मुख के समान हो।
English explanation
Servants should be like the hands, feet, and eyes, and the master like the mouth.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सेवक | सेवा करने वाले | servants |
| कर | हाथ | hands |
| पद | पैर | feet |
| नयन | आँखें | eyes |
| से | जैसे | like |
| मुख | मुख | the mouth |
| सो | जैसा | like |
| साहिबु | स्वामी | master |
| होइ | हो | should be |
2 तुलसी प्रीति कि रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ।।306।।
तुलसी कहते हैं कि प्रेम की यह रीति सुनकर सुयोग्य कवि उसी की सराहना करते हैं।
English explanation
Tulsidas says that, hearing this way of love, discerning poets praise it.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तुलसी | कवि तुलसीदास कहते हैं | the poet Tulsidas says |
| प्रीति | प्रेम | love |
| कि | की | of |
| रीति | रीति या ढंग | way or manner |
| सुनि | सुनकर | having heard |
| सुकबि | सुयोग्य कवि | discerning poets |
| सराहहिं | प्रशंसा करते हैं | praise |
| सोइ | उसी प्रेम-रीति को | that very way of love |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 306
- स्रोत अभिलेख
- 2.306
- सहायक विषय
- श्रीराम-भरत-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 600, 600
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