अयोध्याकाण्ड · दोहा 295 · दोहा/सोरठा
सुर स्वारथी मलीन मन कीन्ह कुमंत्र कुठाटु।।
सुर स्वारथी मलीन मन कीन्ह कुमंत्र कुठाटु।।
रचि प्रपंच माया प्रबल भय भ्रम अरति उचाटु।।295।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.295 · पुस्तक पृ. 590, 591
भावार्थ और शब्दार्थ
1सुर स्वारथी मलीन मन कीन्ह कुमंत्र कुठाटु।।
स्वार्थी और मलिन मन वाले देवताओं ने बुरी सलाह लेकर कुटिल योजना बनाई।
English explanation
The self-serving gods, impure of mind, took evil counsel and devised a wicked scheme.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुर | देवताओं ने | the gods |
| स्वारथी | स्वार्थी | self-serving |
| मलीन | मलिन | impure |
| मन | मन वाले | of mind |
| कीन्ह | बनाया | devised |
| कुमंत्र | बुरी मंत्रणा | evil counsel |
| कुठाटु | कुटिल योजना | a wicked scheme |
2 रचि प्रपंच माया प्रबल भय भ्रम अरति उचाटु।।295।।
उन्होंने प्रबल माया का प्रपंच रचकर भय, भ्रम, बेचैनी और मन का उचाट उत्पन्न किया।
English explanation
Through a contrivance of powerful illusion, they produced fear, confusion, distress, and unsettled minds.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| रचि | रचकर | having contrived |
| प्रपंच | छलपूर्ण जाल | a deceptive contrivance |
| माया | माया का | of illusion |
| प्रबल | प्रबल | powerful |
| भय | भय | fear |
| भ्रम | भ्रम | confusion |
| अरति | बेचैनी, अप्रसन्नता | distress, discontent |
| उचाटु | मन का उचाट | mental unsettledness |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 295
- स्रोत अभिलेख
- 2.295
- सहायक विषय
- जनक-वसिष्ठादि-संवाद, इन्द्रकी चिन्ता, सरस्वतीका इन्द्रको समझाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 590, 591
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।