अयोध्याकाण्ड · दोहा 296 · दोहा/सोरठा
राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत।
राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत।
सकल बिलोकत भरत मुखु बनइ न उतरु देत।।296।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.296 · पुस्तक पृ. 591, 591
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत।
राम की शपथ सुनकर मुनि वसिष्ठ और जनक पूरी सभा सहित संकोच में पड़ गए।
English explanation
Hearing Rama’s oath, the sage Vasishtha and Janaka, along with the entire assembly, became abashed.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| राम | राम की | Rama’s |
| सपथ | शपथ | oath |
| सुनि | सुनकर | having heard |
| मुनि | मुनि वसिष्ठ | the sage Vasishtha |
| जनकु | राजा जनक | King Janaka |
| सकुचे | संकोच में पड़ गए | became abashed; felt constrained |
| सभा | सभा | the assembly |
| समेत | सहित | together with |
2 सकल बिलोकत भरत मुखु बनइ न उतरु देत।।296।।
सब भरत के मुख की ओर देख रहे थे; उत्तर देते नहीं बन पड़ता था।
English explanation
Everyone looked toward Bharata’s face; they could not bring themselves to give an answer.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सकल | सब लोग | everyone |
| बिलोकत | देख रहे थे | were looking at |
| भरत | भरत का | Bharata’s |
| मुखु | मुख | face |
| बनइ | बन पड़ता था, संभव होता था | was possible; could be managed |
| न | नहीं | not |
| उतरु | उत्तर | answer |
| देत | देते | giving |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 296
- स्रोत अभिलेख
- 2.296
- सहायक विषय
- जनक-वसिष्ठादि-संवाद, इन्द्रकी चिन्ता, सरस्वतीका इन्द्रको समझाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 591, 591
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।