अयोध्याकाण्ड · दोहा 297 · दोहा/सोरठा
निरखि बिबेक बिलोचनन्हि सिथिल सनेहँ समाजु।
निरखि बिबेक बिलोचनन्हि सिथिल सनेहँ समाजु।
करि प्रनामु बोले भरतु सुमिरि सीय रघुराजु।।297।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.297 · पुस्तक पृ. 592, 592
भावार्थ और शब्दार्थ
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1निरखि बिबेक बिलोचनन्हि सिथिल सनेहँ समाजु।
विवेक के नेत्रों से सभा को प्रेम के कारण शिथिल देखकर—
English explanation
Seeing with the eyes of discernment that the assembly was overcome by love—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| निरखि | देखकर | seeing |
| बिबेक | विवेक रूपी | of discernment |
| बिलोचनन्हि | नेत्रों से | with the eyes |
| सिथिल | शिथिल, भावविह्वल | overcome and enfeebled |
| सनेहँ | प्रेम के कारण | through love |
| समाजु | सभा को | the assembly |
2 करि प्रनामु बोले भरतु सुमिरि सीय रघुराजु।।297।।
भरत ने प्रणाम किया और सीता तथा रघुकुल के राजा राम का स्मरण करके बोलने लगे।
English explanation
Bharata bowed and, recalling Sita and Rama, king of the Raghu lineage, began to speak.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| करि | करके | having made |
| प्रनामु | प्रणाम | a reverent bow |
| बोले | बोलने लगे | began to speak |
| भरतु | भरत | Bharata, Rama’s brother |
| सुमिरि | स्मरण करके | having recalled |
| सीय | सीता को | Sita |
| रघुराजु | रघुकुल के राजा राम को | Rama, king of the Raghu lineage |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 297
- स्रोत अभिलेख
- 2.297
- सहायक विषय
- श्रीराम-भरत-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 592, 592
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