अयोध्याकाण्ड · दोहा 298 · दोहा/सोरठा
कृपाँ भलाई आपनी नाथ कीन्ह भल मोर।
कृपाँ भलाई आपनी नाथ कीन्ह भल मोर।
दूषन भे भूषन सरिस सुजसु चारु चहु ओर।।298।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.298 · पुस्तक पृ. 592, 593
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1कृपाँ भलाई आपनी नाथ कीन्ह भल मोर।
हे नाथ, अपनी कृपा और भलाई से आपने मेरा भला किया।
English explanation
O lord, through your own grace and goodness, you have done me good.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कृपाँ | कृपा से | through grace |
| भलाई | भलाई, उदारता से | through goodness, generosity |
| आपनी | अपनी | your own |
| नाथ | हे नाथ, हे स्वामी | O lord, O master |
| कीन्ह | किया | did, brought about |
| भल | भला, कल्याण | good, welfare |
| मोर | मेरा | my, mine |
2 दूषन भे भूषन सरिस सुजसु चारु चहु ओर।।298।।
मेरे दोष आभूषणों के समान हो गए, और चारों ओर सुंदर सुयश फैल गया।
English explanation
My faults became like ornaments, and fair renown spread in every direction.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| दूषन | दोष | faults, blemishes |
| भे | हो गए | became |
| भूषन | आभूषण | ornaments |
| सरिस | समान | like |
| सुजसु | सुयश, अच्छी कीर्ति | good reputation, renown |
| चारु | सुंदर, मनोहर | beautiful, pleasing |
| चहु | चारों | all four |
| ओर | दिशाओं में | in the directions |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 298
- स्रोत अभिलेख
- 2.298
- सहायक विषय
- श्रीराम-भरत-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 592, 593
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।