अयोध्याकाण्ड · दोहा 294 · दोहा/सोरठा
रामु सनेह सकोच बस कह ससोच सुरराज।
रामु सनेह सकोच बस कह ससोच सुरराज।
रचहु प्रपंचहि पंच मिलि नाहिं त भयउ अकाजु।।294।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.294 · पुस्तक पृ. 589, 590
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1रामु सनेह सकोच बस कह ससोच सुरराज।
देवराज इंद्र ने चिंतित होकर कहा, ‘राम स्नेह और संकोच के वश में हैं।’
English explanation
Indra, king of the gods, said anxiously, ‘Rama is governed by affection and reluctance to disappoint.’
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| रामु | राम | Rama |
| सनेह | स्नेह | affection |
| सकोच | संकोच; दूसरों को दुख देने में झिझक | hesitation to disappoint others |
| बस | के वश में | under the sway of |
| कह | कहा | said |
| ससोच | चिंतित होकर | anxiously |
| सुरराज | देवराज इंद्र | Indra, king of the gods |
2 रचहु प्रपंचहि पंच मिलि नाहिं त भयउ अकाजु।।294।।
‘तुम सब मिलकर कोई प्रपंच रचो; नहीं तो हमारा काम बिगड़ गया समझो।’
English explanation
‘Join together and devise a stratagem; otherwise, consider our purpose thwarted.’
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| रचहु | रचो | devise |
| प्रपंचहि | प्रपंच अथवा छलपूर्ण युक्ति | a deceptive stratagem |
| पंच | तुम सब; विचार करने वाले सभासद | all of you, the assembled counselors |
| मिलि | मिलकर | together |
| नाहिं | नहीं तो | if not |
| त | तो | then |
| भयउ | हो गया; हुआ समझो | has come about; consider it so |
| अकाजु | काम का बिगड़ना | failure of the intended purpose |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 294
- स्रोत अभिलेख
- 2.294
- सहायक विषय
- जनक-वसिष्ठादि-संवाद, इन्द्रकी चिन्ता, सरस्वतीका इन्द्रको समझाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 589, 590
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।