अयोध्याकाण्ड · दोहा 293 · दोहा/सोरठा
राखि राम रुख धरमु ब्रतु पराधीन मोहि जानि।
राखि राम रुख धरमु ब्रतु पराधीन मोहि जानि।
सब कें संमत सर्ब हित करिअ पेमु पहिचानि।।293।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.293 · पुस्तक पृ. 588, 589
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1राखि राम रुख धरमु ब्रतु पराधीन मोहि जानि।
राम की इच्छा, धर्म और व्रत को बनाए रखते हुए, और मुझे पराधीन जानकर—
English explanation
Preserving Rama’s wishes, duty, and vow, and recognizing that I am subject to another’s authority—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| राखि | बनाए रखकर | preserving |
| राम | राम की | Rama’s |
| रुख | इच्छा; अभिप्राय | wishes; intention |
| धरमु | धर्म | duty; righteousness |
| ब्रतु | व्रत; संकल्प | vow; resolve |
| पराधीन | दूसरे की आज्ञा के अधीन | subject to another’s authority |
| मोहि | मुझे | me |
| जानि | जानकर | recognizing |
2 सब कें संमत सर्ब हित करिअ पेमु पहिचानि।।293।।
मेरे प्रेम को पहचानकर ऐसा कीजिए जो सबको स्वीकार हो और सबके हित में हो।
English explanation
Recognizing my love, please do what is acceptable to everyone and beneficial to all.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सब | सब | everyone |
| कें | को; के द्वारा | to; by |
| संमत | स्वीकृत; सम्मत | approved; acceptable |
| सर्ब | सभी का | of all |
| हित | हित; कल्याण | welfare; benefit |
| करिअ | कीजिए | please do |
| पेमु | प्रेम | love |
| पहिचानि | पहचानकर | recognizing |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 293
- स्रोत अभिलेख
- 2.293
- सहायक विषय
- जनक-वसिष्ठादि-संवाद, इन्द्रकी चिन्ता, सरस्वतीका इन्द्रको समझाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 588, 589
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