अयोध्याकाण्ड · दोहा 292 · दोहा/सोरठा
राम सत्यब्रत धरम रत सब कर सीलु सनेहु।।
राम सत्यब्रत धरम रत सब कर सीलु सनेहु।।
संकट सहत सकोच बस कहिअ जो आयसु देहु।।292।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.292 · पुस्तक पृ. 587, 588
भावार्थ और शब्दार्थ
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1राम सत्यब्रत धरम रत सब कर सीलु सनेहु।।
राम सत्य के व्रती और धर्म में रत हैं; सबके शील और स्नेह का ध्यान रखते हैं।
English explanation
Rama is vowed to truth and devoted to righteousness; he is mindful of everyone’s courtesy and affection.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| राम | राम | Rama |
| सत्यब्रत | सत्य का व्रत निभाने वाले | vowed to truth |
| धरम | धर्म में | in righteousness |
| रत | रत; समर्पित | devoted |
| सब | सबका | everyone |
| कर | का | of |
| सीलु | शील; विनम्र व्यवहार | courtesy; gentle conduct |
| सनेहु | स्नेह | affection |
2 संकट सहत सकोच बस कहिअ जो आयसु देहु।।292।।
इसी संकोच के वश राम कष्ट सहते हैं। यदि तुम अनुमति दो, तो मैं कुछ कहूँ।
English explanation
Under this restraint, Rama endures hardship. If you give permission, I shall speak.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| संकट | कष्ट | hardship |
| सहत | सहते हैं | endures |
| सकोच | संकोच; दूसरों का मान रखने का लिहाज | restraint out of regard for others |
| बस | के वश में | under the sway of |
| कहिअ | मैं कहूँ | let me speak |
| जो | यदि | if |
| आयसु | आज्ञा; अनुमति | permission |
| देहु | तुम दो | you give |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 292
- स्रोत अभिलेख
- 2.292
- सहायक विषय
- जनक-वसिष्ठादि-संवाद, इन्द्रकी चिन्ता, सरस्वतीका इन्द्रको समझाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 587, 588
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