अयोध्याकाण्ड · दोहा 291 · दोहा/सोरठा
ग्यान निधान सुजान सुचि धरम धीर नरपाल।
ग्यान निधान सुजान सुचि धरम धीर नरपाल।
तुम्ह बिनु असमंजस समन को समरथ एहि काल।।291।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.291 · पुस्तक पृ. 587, 587
भावार्थ और शब्दार्थ
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1ग्यान निधान सुजान सुचि धरम धीर नरपाल।
हे ज्ञान के भंडार, सुबुद्धि, पवित्र और धर्म में अडिग राजा!
English explanation
O king, treasury of knowledge, discerning, pure, and steadfast in righteousness!
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| ग्यान | ज्ञान के | of knowledge |
| निधान | भंडार | treasury |
| सुजान | सुबुद्धि; विवेकशील | discerning; wise |
| सुचि | पवित्र | pure |
| धरम | धर्म में | in righteousness |
| धीर | अडिग | steadfast |
| नरपाल | हे राजा जनक | O King Janaka |
2 तुम्ह बिनु असमंजस समन को समरथ एहि काल।।291।।
इस समय आपके सिवा इस असमंजस को दूर करने में कौन समर्थ है?
English explanation
At this time, who besides you is capable of resolving this dilemma?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तुम्ह | आपके | you |
| बिनु | बिना; सिवा | besides |
| असमंजस | असमंजस; दुविधा | dilemma |
| समन | दूर करने में | in resolving |
| को | कौन | who |
| समरथ | समर्थ | capable |
| एहि | इस | this |
| काल | समय में | at this time |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 291
- स्रोत अभिलेख
- 2.291
- सहायक विषय
- जनक-वसिष्ठादि-संवाद, इन्द्रकी चिन्ता, सरस्वतीका इन्द्रको समझाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 587, 587
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