अयोध्याकाण्ड · दोहा 290 · दोहा/सोरठा
प्रान प्रान के जीव के जिव सुख के सुख राम।
प्रान प्रान के जीव के जिव सुख के सुख राम।
तुम्ह तजि तात सोहात गृह जिन्हहि तिन्हहिं बिधि बाम।।290।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.29 · पुस्तक पृ. 586, 586
भावार्थ और शब्दार्थ
1प्रान प्रान के जीव के जिव सुख के सुख राम।
हे राम, तुम प्राणों के भी प्राण, जीव के भी जीवन और सुख के भी सुख हो।
English explanation
Rama, you are the very life of life, the life of the living soul, and the joy of joy itself.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| प्रान | प्राणस्वरूप | the very life |
| प्रान | प्राणों | of the vital breaths |
| के | के | of |
| जीव | जीव | the living soul |
| के | के | of |
| जिव | जीवन | the life |
| सुख | सुख | joy |
| के | के | of |
| सुख | सारभूत सुख | the essential joy |
| राम | हे राम | O Rama |
2 तुम्ह तजि तात सोहात गृह जिन्हहि तिन्हहिं बिधि बाम।।290।।
हे प्रिय, तुम्हें छोड़कर जिन्हें घर सुहाता है, उनके लिए विधाता प्रतिकूल है।
English explanation
Dear one, for those who find home pleasing after leaving you, the Creator is adverse.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तुम्ह | तुम्हें | you |
| तजि | छोड़कर | having left |
| तात | हे प्रिय | dear one |
| सोहात | सुहाता है | is pleasing |
| गृह | घर | home |
| जिन्हहि | जिन्हें | to those whom |
| तिन्हहिं | उन्हीं के लिए | for those very people |
| बिधि | विधाता | the Creator |
| बाम | प्रतिकूल | adverse |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 290
- स्रोत अभिलेख
- 2.29
- सहायक विषय
- जनक-सुनयना-संवाद, भरतजीकी महिमा
- मुद्रित पृष्ठ
- 586, 586
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।