अयोध्याकाण्ड · दोहा 200 · दोहा/सोरठा
सुखस्वरुप रघुबंसमनि मंगल मोद निधान।
सुखस्वरुप रघुबंसमनि मंगल मोद निधान।
ते सोवत कुस डासि महि बिधि गति अति बलवान।।200।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.2 · पुस्तक पृ. 509, 510
भावार्थ और शब्दार्थ
1सुखस्वरुप रघुबंसमनि मंगल मोद निधान।
जो सुख के स्वरूप, रघुवंश के रत्न और मंगल तथा आनंद के भंडार हैं—
English explanation
He who is the embodiment of happiness, the jewel of Raghu’s lineage, and the treasury of auspiciousness and joy—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुखस्वरुप | सुख के मूर्त स्वरूप | embodiment of happiness |
| रघुबंसमनि | रघुवंश के रत्न, राम | Rama, jewel of Raghu’s lineage |
| मंगल | मंगल; कल्याण | auspiciousness; well-being |
| मोद | आनंद | joy |
| निधान | भंडार | treasury; store |
2 ते सोवत कुस डासि महि बिधि गति अति बलवान।।200।।
वे ही राम पृथ्वी पर कुश बिछाकर सो रहे हैं; विधि की गति अत्यंत बलवान है।
English explanation
That very Rama sleeps on the ground upon spread-out kusha grass; the course of fate is exceedingly powerful.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| ते | वे ही राम | that very Rama |
| सोवत | सो रहे हैं | is sleeping |
| कुस | कुश घास | kusha grass |
| डासि | बिछाकर | having spread out |
| महि | पृथ्वी पर | on the ground |
| बिधि | विधाता; भाग्य की | of destiny; of fate |
| गति | गति; कार्यप्रणाली | course; working |
| अति | अत्यंत | exceedingly |
| बलवान | शक्तिशाली | powerful |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 200
- स्रोत अभिलेख
- 2.2
- सहायक विषय
- भरत-निषाद-मिलन और संवाद एवं भरतजीका तथा नगरवासियोंका प्रेम
- मुद्रित पृष्ठ
- 509, 510
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।