अयोध्याकाण्ड · दोहा 98 · दोहा/सोरठा
सासु ससुर सन मोरि हुँति बिनय करबि परि पायँ।।
सासु ससुर सन मोरि हुँति बिनय करबि परि पायँ।।
मोर सोचु जनि करिअ कछु मैं बन सुखी सुभायँ।।98।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.98 · पुस्तक पृ. 424, 425
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1सासु ससुर सन मोरि हुँति बिनय करबि परि पायँ।।
मेरी ओर से सास और ससुर के चरणों में पड़कर उनसे विनती करना।
English explanation
Bow at my mother-in-law’s and father-in-law’s feet and make this request to them on my behalf.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सासु | सास से | to my mother-in-law |
| ससुर | ससुर से | to my father-in-law |
| सन | से; के समक्ष | to; before |
| मोरि | मेरी | my |
| हुँति | ओर से | on behalf of |
| बिनय | विनती | a humble request |
| करबि | करना | make; please make |
| परि | पड़कर; झुककर | bowing down |
| पायँ | चरणों में | at their feet |
2 मोर सोचु जनि करिअ कछु मैं बन सुखी सुभायँ।।98।।
मेरे लिए कोई चिंता न करें; मैं वन में सहज ही सुखी हूँ।
English explanation
Please do not worry about me at all; I am naturally happy in the forest.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मोर | मेरे विषय में | about me |
| सोचु | चिंता | worry |
| जनि | मत; न | do not |
| करिअ | करें | please do |
| कछु | कुछ भी; तनिक भी | any; at all |
| मैं | मैं | I |
| बन | वन में | in the forest |
| सुखी | सुखी हूँ | am happy |
| सुभायँ | सहज ही; स्वभाव से | naturally; with ease |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 98
- स्रोत अभिलेख
- 2.98
- सहायक विषय
- लक्ष्मण-निषाद-संवाद, श्रीराम-सीतासे सुमन्त्रका संवाद, सुमन्त्रका लौटना
- मुद्रित पृष्ठ
- 424, 425
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।