अयोध्याकाण्ड · दोहा 97 · दोहा/सोरठा
आरति बस सनमुख भइउँ बिलगु न मानब तात।
आरति बस सनमुख भइउँ बिलगु न मानब तात।
आरजसुत पद कमल बिनु बादि जहाँ लगि नात।।97।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.97 · पुस्तक पृ. 423, 424
भावार्थ और शब्दार्थ
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1आरति बस सनमुख भइउँ बिलगु न मानब तात।
व्याकुलता के वश होकर मैं आपके सामने बोलने लगी हूँ; हे तात, इसे बुरा न मानिए।
English explanation
Overcome by anguish, I have come forward to speak before you; dear father, please do not take offence.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| आरति | व्याकुलता | anguish |
| बस | के वश में | under the sway of |
| सनमुख | सामने; सम्मुख | before you |
| भइउँ | मैं हुई हूँ | I have come |
| बिलगु | बुरा; अप्रिय | offensive |
| न | न | not |
| मानब | मानिएगा | please consider |
| तात | हे पिता-समान आदरणीय | dear father |
2 आरजसुत पद कमल बिनु बादि जहाँ लगि नात।।97।।
मेरे आर्य स्वामी राम के चरणकमलों के बिना जितने भी नाते हैं, सब व्यर्थ हैं।
English explanation
Without the lotus feet of my noble husband Rama, all other ties are meaningless.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| आरजसुत | आर्य स्वामी राम के | of my noble husband Rama |
| पद | चरण | feet |
| कमल | कमल-समान | lotus-like |
| बिनु | के बिना | without |
| बादि | व्यर्थ | meaningless |
| जहाँ | जहाँ तक | as far as |
| लगि | तक | extending |
| नात | नाते; संबंध | ties; relationships |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 97
- स्रोत अभिलेख
- 2.97
- सहायक विषय
- लक्ष्मण-निषाद-संवाद, श्रीराम-सीतासे सुमन्त्रका संवाद, सुमन्त्रका लौटना
- मुद्रित पृष्ठ
- 423, 424
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।