अयोध्याकाण्ड · दोहा 96 · दोहा/सोरठा
मइकें ससरें सकल सुख जबहिं जहाँ मनु मान।।
मइकें ससरें सकल सुख जबहिं जहाँ मनु मान।।
तँह तब रहिहि सुखेन सिय जब लगि बिपति बिहान।।96।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.96 · पुस्तक पृ. 422, 423
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1मइकें ससरें सकल सुख जबहिं जहाँ मनु मान।।
मायके और ससुराल, दोनों में सभी सुख हैं; जब जहाँ सीता का मन चाहे—
English explanation
Every comfort is available at her parental home and her in-laws’ home; whenever and wherever Sita prefers—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मइकें | मायके में | at her parental home |
| ससरें | ससुराल में | at her in-laws’ home |
| सकल | सभी | all |
| सुख | सुख-सुविधाएँ | comforts |
| जबहिं | जब भी | whenever |
| जहाँ | जहाँ | wherever |
| मनु | मन | her mind |
| मान | चाहे; संतुष्ट हो | is content; prefers |
2 तँह तब रहिहि सुखेन सिय जब लगि बिपति बिहान।।96।।
—सीता तब वहीं सुखपूर्वक रहेंगी, जब तक विपत्ति का समय बीत न जाए।
English explanation
—Sita will then stay there comfortably until this time of adversity passes.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तँह | वहीं | there |
| तब | तब | then |
| रहिहि | रहेंगी | will stay |
| सुखेन | सुखपूर्वक | comfortably |
| सिय | सीता | Sita |
| जब | जब | until |
| लगि | तक | such time as |
| बिपति | विपत्ति | adversity |
| बिहान | बीत जाए | passes |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 96
- स्रोत अभिलेख
- 2.96
- सहायक विषय
- लक्ष्मण-निषाद-संवाद, श्रीराम-सीतासे सुमन्त्रका संवाद, सुमन्त्रका लौटना
- मुद्रित पृष्ठ
- 422, 423
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।