अयोध्याकाण्ड · दोहा 95 · दोहा/सोरठा
पितु पद गहि कहि कोटि नति बिनय करब कर जोरि।
पितु पद गहि कहि कोटि नति बिनय करब कर जोरि।
चिंता कवनिहु बात कै तात करिअ जनि मोरि।।95।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.95 · पुस्तक पृ. 422, 422
भावार्थ और शब्दार्थ
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1पितु पद गहि कहि कोटि नति बिनय करब कर जोरि।
पिताजी के चरण पकड़कर, मेरी ओर से करोड़ों प्रणाम कहकर, हाथ जोड़कर विनती करना।
English explanation
Clasp my father's feet, convey countless salutations on my behalf, and make this request with folded hands.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पितु | पिता के | my father's |
| पद | चरण | feet |
| गहि | पकड़कर | clasping |
| कहि | कहकर; निवेदित करके | conveying |
| कोटि | करोड़ों; असंख्य | millions; countless |
| नति | प्रणाम | salutations |
| बिनय | विनती | a humble request |
| करब | करना | make |
| कर | हाथ | hands |
| जोरि | जोड़कर | folding together |
2 चिंता कवनिहु बात कै तात करिअ जनि मोरि।।95।।
हे पिताजी, किसी भी बात को लेकर मेरी चिंता मत कीजिए।
English explanation
Dear father, please do not worry about me on any account.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| चिंता | फिक्र | worry |
| कवनिहु | किसी भी | any whatsoever |
| बात | बात | matter |
| कै | की; के विषय में | concerning |
| तात | हे पिताजी | dear father |
| करिअ | कीजिए | please do |
| जनि | मत | not |
| मोरि | मेरी; मेरे लिए | about me |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 95
- स्रोत अभिलेख
- 2.95
- सहायक विषय
- लक्ष्मण-निषाद-संवाद, श्रीराम-सीतासे सुमन्त्रका संवाद, सुमन्त्रका लौटना
- मुद्रित पृष्ठ
- 422, 422
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