अयोध्याकाण्ड · दोहा 110 · दोहा/सोरठा
सजल नयन तन पुलकि निज इष्टदेउ पहिचानि।
सजल नयन तन पुलकि निज इष्टदेउ पहिचानि।
परेउ दंड जिमि धरनितल दसा न जाइ बखानि।।110।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.11 · पुस्तक पृ. 434, 435
भावार्थ और शब्दार्थ
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1सजल नयन तन पुलकि निज इष्टदेउ पहिचानि।
अपने इष्टदेव को पहचानकर उसकी आँखों में आँसू भर आए और शरीर रोमांचित हो उठा।
English explanation
Recognizing his chosen deity, his eyes filled with tears and his body thrilled with goosebumps.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सजल | आँसुओं से भरे | filled with tears |
| नयन | नेत्र | eyes |
| तन | शरीर | body |
| पुलकि | रोमांचित होकर | thrilling with goosebumps |
| निज | अपने | his own |
| इष्टदेउ | इष्टदेव, यहाँ राम | chosen deity, here Rama |
| पहिचानि | पहचानकर | having recognized |
2 परेउ दंड जिमि धरनितल दसा न जाइ बखानि।।110।।
वह धरती पर दंड की तरह सीधा पड़कर प्रणाम करने लगा; उसकी दशा का वर्णन नहीं किया जा सकता।
English explanation
He fell flat upon the ground like a staff in prostration; his state cannot be described.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| परेउ | गिर पड़ा | fell down |
| दंड | दंड, सीधी छड़ी | a straight staff |
| जिमि | की तरह | like |
| धरनितल | धरती की सतह पर | upon the ground |
| दसा | उसकी अवस्था | his state |
| न | नहीं | not |
| जाइ | जा सकती | can be |
| बखानि | वर्णित की | described |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 110
- स्रोत अभिलेख
- 2.11
- सहायक विषय
- प्रयाग पहुँचना, श्रीराम-भरद्वाज-संवाद, यमुनातीरनिवासियोंका प्रेम
- मुद्रित पृष्ठ
- 434, 435
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।