अयोध्याकाण्ड · दोहा 111 · दोहा/सोरठा
तब रघुबीर अनेक बिधि सखहि सिखावनु दीन्ह।
तब रघुबीर अनेक बिधि सखहि सिखावनु दीन्ह।
राम रजायसु सीस धरि भवन गवनु तेंइँ कीन्ह।।111।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.111 · पुस्तक पृ. 435, 436
भावार्थ और शब्दार्थ
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1तब रघुबीर अनेक बिधि सखहि सिखावनु दीन्ह।
तब रघुवंश के वीर राम ने अपने मित्र को अनेक प्रकार से समझाया।
English explanation
Then Rama, the hero of Raghu’s lineage, counselled his friend in many ways.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तब | तब | then |
| रघुबीर | रघुवंश के वीर राम ने | Rama, hero of Raghu’s lineage |
| अनेक | अनेक | many |
| बिधि | प्रकार से | in ways |
| सखहि | मित्र गुह को | to his friend Guha |
| सिखावनु | समझाइश | counsel |
| दीन्ह | दी | gave |
2 राम रजायसु सीस धरि भवन गवनु तेंइँ कीन्ह।।111।।
राम की आज्ञा आदरपूर्वक सिर पर धारण करके वह अपने घर चला गया।
English explanation
Reverently accepting Rama’s command, he departed for his home.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| राम | राम की | Rama’s |
| रजायसु | आज्ञा | command |
| सीस | सिर पर | upon his head |
| धरि | धारण करके | placing |
| भवन | घर को | homeward |
| गवनु | प्रस्थान | departure |
| तेंइँ | उसने | he |
| कीन्ह | किया | made |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 111
- स्रोत अभिलेख
- 2.111
- सहायक विषय
- तापस-प्रकरण
- मुद्रित पृष्ठ
- 435, 436
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