अयोध्याकाण्ड · दोहा 112 · दोहा/सोरठा
एहि बिधि पूँछहिं प्रेम बस पुलक गात जलु नैन।
एहि बिधि पूँछहिं प्रेम बस पुलक गात जलु नैन।
कृपासिंधु फेरहि तिन्हहि कहि बिनीत मृदु बैन।।112।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.112 · पुस्तक पृ. 436, 437
भावार्थ और शब्दार्थ
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1एहि बिधि पूँछहिं प्रेम बस पुलक गात जलु नैन।
इस प्रकार प्रेम के वशीभूत होकर वे पूछते हैं; उनके शरीर रोमांचित हैं और आँखों में आँसू हैं।
English explanation
Thus, overcome with affection, they ask, their bodies thrilled and their eyes filled with tears.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| एहि | इस | this |
| बिधि | प्रकार | manner |
| पूँछहिं | पूछते हैं | they ask |
| प्रेम | प्रेम के | of affection |
| बस | वश में | under the sway |
| पुलक | रोमांच | a thrill with hair standing on end |
| गात | शरीर में | in their bodies |
| जलु | आँसू | tears |
| नैन | आँखों में | in their eyes |
2 कृपासिंधु फेरहि तिन्हहि कहि बिनीत मृदु बैन।।112।।
कृपा के सागर राम विनम्र और कोमल वचन कहकर उन्हें लौटा देते हैं।
English explanation
Rama, the ocean of compassion, sends them back with humble, gentle words.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कृपासिंधु | कृपा के सागर राम | Rama, the ocean of compassion |
| फेरहि | लौटा देते हैं | sends back |
| तिन्हहि | उन लोगों को | those people |
| कहि | कहकर | having spoken |
| बिनीत | विनम्र | humble |
| मृदु | कोमल | gentle |
| बैन | वचन | words |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 112
- स्रोत अभिलेख
- 2.112
- सहायक विषय
- यमुनाको प्रणाम, वनवासियोंका प्रेम
- मुद्रित पृष्ठ
- 436, 437
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