अयोध्याकाण्ड · दोहा 113 · दोहा/सोरठा
छाँह करहि घन बिबुधगन बरषहि सुमन सिहाहिं।
छाँह करहि घन बिबुधगन बरषहि सुमन सिहाहिं।
देखत गिरि बन बिहग मृग रामु चले मग जाहिं।।113।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.113 · पुस्तक पृ. 437, 438
भावार्थ और शब्दार्थ
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1छाँह करहि घन बिबुधगन बरषहि सुमन सिहाहिं।
बादल छाया करते हैं; देवगण फूल बरसाते हैं और ईर्ष्याभरी प्रशंसा करते हैं।
English explanation
Clouds provide shade; the gods shower flowers and look on with envious admiration.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| छाँह | छाया | shade |
| करहि | करते हैं | provide |
| घन | बादल | clouds |
| बिबुधगन | देवताओं के समूह | the hosts of gods |
| बरषहि | बरसाते हैं | shower |
| सुमन | फूल | flowers |
| सिहाहिं | ईर्ष्याभरी प्रशंसा करते हैं | admire with envy |
2 देखत गिरि बन बिहग मृग रामु चले मग जाहिं।।113।।
पर्वतों, वनों, पक्षियों और वन्य पशुओं को देखते हुए राम मार्ग पर आगे चले जाते हैं।
English explanation
Looking at mountains, forests, birds, and wild animals, Rama continues along the road.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| देखत | देखते हुए | looking at |
| गिरि | पर्वत | mountains |
| बन | वन | forests |
| बिहग | पक्षी | birds |
| मृग | हिरण और वन्य पशु | deer and wild animals |
| रामु | राम | Rama |
| चले | चलते हुए | moving onward |
| मग | मार्ग पर | along the road |
| जाहिं | जाते हैं | proceeds |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 113
- स्रोत अभिलेख
- 2.113
- सहायक विषय
- यमुनाको प्रणाम, वनवासियोंका प्रेम
- मुद्रित पृष्ठ
- 437, 438
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