अयोध्याकाण्ड · दोहा 114 · दोहा/सोरठा
एक देखिं बट छाँह भलि डासि मृदुल तृन पात।
एक देखिं बट छाँह भलि डासि मृदुल तृन पात।
कहहिं गवाँइअ छिनुकु श्रमु गवनब अबहिं कि प्रात।।114।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.114 · पुस्तक पृ. 438, 438
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1एक देखिं बट छाँह भलि डासि मृदुल तृन पात।
कुछ लोग बरगद की अच्छी छाया देखकर वहाँ कोमल घास और पत्ते बिछाते हैं।
English explanation
Some, seeing pleasant shade beneath a banyan tree, spread soft grass and leaves there.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| एक | कुछ लोग | some people |
| देखिं | देखकर | having seen |
| बट | बरगद की | of a banyan tree |
| छाँह | छाया | shade |
| भलि | अच्छी; सुखद | pleasant |
| डासि | बिछाकर | having spread |
| मृदुल | कोमल | soft |
| तृन | घास | grass |
| पात | पत्ते | leaves |
2 कहहिं गवाँइअ छिनुकु श्रमु गवनब अबहिं कि प्रात।।114।।
वे कहते हैं: थोड़ी देर विश्राम करके थकान दूर कीजिए; फिर अभी चले जाइए या प्रातः।
English explanation
They say: rest a little and relieve your fatigue; then depart now or in the morning.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कहहिं | कहते हैं | say |
| गवाँइअ | दूर कीजिए | please dispel |
| छिनुकु | थोड़ी देर में; क्षण भर | for a little while |
| श्रमु | थकान | fatigue |
| गवनब | प्रस्थान कीजिए | depart |
| अबहिं | अभी | now |
| कि | या | or |
| प्रात | प्रातः; सुबह | in the morning |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 114
- स्रोत अभिलेख
- 2.114
- सहायक विषय
- यमुनाको प्रणाम, वनवासियोंका प्रेम
- मुद्रित पृष्ठ
- 438, 438
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।