अयोध्याकाण्ड · दोहा 31 · दोहा/सोरठा
लोभु न रामहि राजु कर बहुत भरत पर प्रीति।
लोभु न रामहि राजु कर बहुत भरत पर प्रीति।
मैं बड़ छोट बिचारि जियँ करत रहेउँ नृपनीति।।31।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.31 · पुस्तक पृ. 369, 370
भावार्थ और शब्दार्थ
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1 लोभु न रामहि राजु कर बहुत भरत पर प्रीति।
राम को राज्य का लोभ नहीं है; उनका भरत पर बहुत प्रेम है।
English explanation
Rama has no desire for the kingdom; he has great love for Bharata.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| लोभु | लोभ | desire |
| न | नहीं | not |
| रामहि | राम को | to Rama |
| राजु | राज्य | the kingdom |
| कर | का | for |
| बहुत | बहुत | great |
| भरत | भरत | Bharata |
| पर | के प्रति | toward |
| प्रीति | प्रेम | love |
2 मैं बड़ छोट बिचारि जियँ करत रहेउँ नृपनीति।।31।।
मैं तो मन में बड़े और छोटे का विचार करके राजपरंपरा का पालन कर रहा था।
English explanation
I was merely following royal custom, considering in my heart who was elder and who was younger.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मैं | मैं | I |
| बड़ | बड़ा, ज्येष्ठ | elder |
| छोट | छोटा, कनिष्ठ | younger |
| बिचारि | विचार करके | considering |
| जियँ | मन में | in my heart |
| करत | पालन करता | following |
| रहेउँ | रहा था | was |
| नृपनीति | राजपरंपरा, ज्येष्ठ को राज्य देने की नीति | royal custom of succession by seniority |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 31
- स्रोत अभिलेख
- 2.31
- सहायक विषय
- दशरथ-कैकेयी-संवाद और दशरथ-शोक, सुमन्त्रका महलमें जाना और वहाँसे लौटकर श्रीरामजीको महलमें भेजना
- मुद्रित पृष्ठ
- 369, 370
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