अयोध्याकाण्ड · दोहा 30 · दोहा/सोरठा
धरम धुरंधर धीर धरि नयन उघारे रायँ।
धरम धुरंधर धीर धरि नयन उघारे रायँ।
सिरु धुनि लीन्हि उसास असि मारेसि मोहि कुठायँ।।30।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.3 · पुस्तक पृ. 368, 369
भावार्थ और शब्दार्थ
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1धरम धुरंधर धीर धरि नयन उघारे रायँ।
धर्म का भार सँभालने वाले राजा ने धैर्य धारण करके आँखें खोलीं।
English explanation
The king, a steadfast upholder of righteousness, gathered his composure and opened his eyes.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| धरम | धर्म का | of righteousness |
| धुरंधर | भार सँभालने वाले; महान धारक | steadfast bearer; upholder |
| धीर | धैर्य | composure; fortitude |
| धरि | धारण करके | having gathered |
| नयन | आँखें | eyes |
| उघारे | खोलीं | opened |
| रायँ | राजा दशरथ ने | King Dasharatha |
2 सिरु धुनि लीन्हि उसास असि मारेसि मोहि कुठायँ।।30।।
सिर धुनकर राजा ने आह भरी और कहा, ‘तूने मुझे ऐसी चोट बहुत नाजुक स्थान पर मारी है।’
English explanation
Beating his head, the king heaved a sigh: ‘You have struck me so at a most vulnerable spot.’
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सिरु | सिर | head |
| धुनि | पीटकर; धुनकर | beating |
| लीन्हि | ली; भरी | took; heaved |
| उसास | आह; लंबी साँस | a sigh |
| असि | ऐसी; इस प्रकार | such; thus |
| मारेसि | तूने मारा; चोट पहुँचाई | you struck; hurt |
| मोहि | मुझे | me |
| कुठायँ | कुसमय या नाजुक स्थान पर | at an ill-chosen, vulnerable spot |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 30
- स्रोत अभिलेख
- 2.3
- सहायक विषय
- दशरथ-कैकेयी-संवाद और दशरथ-शोक, सुमन्त्रका महलमें जाना और वहाँसे लौटकर श्रीरामजीको महलमें भेजना
- मुद्रित पृष्ठ
- 368, 369
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