अयोध्याकाण्ड · दोहा 29 · दोहा/सोरठा
कवनें अवसर का भयउ गयउँ नारि बिस्वास।
कवनें अवसर का भयउ गयउँ नारि बिस्वास।
जोग सिद्धि फल समय जिमि जतिहि अबिद्या नास।।29।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.29 · पुस्तक पृ. 367, 368
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1कवनें अवसर का भयउ गयउँ नारि बिस्वास।
कैसे अवसर पर यह क्या हो गया! मैं अपनी पत्नी के विश्वास में पड़ गया।
English explanation
At such a moment, what has happened! I put my trust in my wife.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कवनें | कैसे; किस | what kind of; which |
| अवसर | अवसर पर | at a moment |
| का | क्या | what |
| भयउ | हो गया | has happened |
| गयउँ | मैं पड़ गया | I fell into |
| नारि | पत्नी के | my wife’s |
| बिस्वास | विश्वास में | trust |
2 जोग सिद्धि फल समय जिमि जतिहि अबिद्या नास।।29।।
जैसे योग-सिद्धि का फल मिलने के समय अविद्या किसी संयमी साधक का नाश कर दे।
English explanation
As ignorance might ruin a disciplined ascetic just when the fruit of yogic accomplishment is about to be attained.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जोग | योग की साधना | yogic practice |
| सिद्धि | सिद्धि; साधना की सफलता | accomplishment; attainment |
| फल | फल; उपलब्धि | fruit; reward |
| समय | मिलने के समय | at the time of attainment |
| जिमि | जैसे | just as |
| जतिहि | संयमी साधक को | a disciplined ascetic |
| अबिद्या | अविद्या; अज्ञान | ignorance; delusion |
| नास | नष्ट कर दे | ruins |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 29
- स्रोत अभिलेख
- 2.29
- सहायक विषय
- दशरथ-कैकेयी-संवाद और दशरथ-शोक, सुमन्त्रका महलमें जाना और वहाँसे लौटकर श्रीरामजीको महलमें भेजना
- मुद्रित पृष्ठ
- 367, 368
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।