अयोध्याकाण्ड · दोहा 32 · दोहा/सोरठा
प्रिया हास रिस परिहरहि मागु बिचारि बिबेकु।
प्रिया हास रिस परिहरहि मागु बिचारि बिबेकु।
जेहिं देखाँ अब नयन भरि भरत राज अभिषेकु।।32।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.32 · पुस्तक पृ. 370, 371
भावार्थ और शब्दार्थ
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1 प्रिया हास रिस परिहरहि मागु बिचारि बिबेकु।
प्रिये, परिहास और क्रोध छोड़ो; विवेक से विचार करके ऐसा वर माँगो—
English explanation
Beloved, set aside jest and anger; reflect with discernment and ask for a boon—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| प्रिया | हे प्रिये | beloved |
| हास | परिहास | jest |
| रिस | क्रोध | anger |
| परिहरहि | छोड़ दो | set aside |
| मागु | माँगो | ask for |
| बिचारि | विचार करके | having reflected |
| बिबेकु | विवेक से | with discernment |
2 जेहिं देखाँ अब नयन भरि भरत राज अभिषेकु।।32।।
जिससे मैं अब भरत का राज्याभिषेक आँख भरकर देख सकूँ।
English explanation
—so that I may now behold Bharata’s royal consecration to my heart’s content.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जेहिं | जिससे | so that |
| देखाँ | मैं देख सकूँ | I may behold |
| अब | अब | now |
| नयन | आँखें | eyes |
| भरि | भरकर, जी भरकर | fully, to my heart’s content |
| भरत | भरत का | Bharata’s |
| राज | राज्य का | royal |
| अभिषेकु | अभिषेक, राजतिलक | consecration, coronation |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 32
- स्रोत अभिलेख
- 2.32
- सहायक विषय
- दशरथ-कैकेयी-संवाद और दशरथ-शोक, सुमन्त्रका महलमें जाना और वहाँसे लौटकर श्रीरामजीको महलमें भेजना
- मुद्रित पृष्ठ
- 370, 371
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