अयोध्याकाण्ड · दोहा 236 · दोहा/सोरठा
राम सैल सोभा निरखि भरत हृदयँ अति पेमु।
राम सैल सोभा निरखि भरत हृदयँ अति पेमु।
तापस तप फलु पाइ जिमि सुखी सिरानें नेमु।।236।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.236 · पुस्तक पृ. 540, 540
भावार्थ और शब्दार्थ
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1राम सैल सोभा निरखि भरत हृदयँ अति पेमु।
राम के पर्वत की शोभा देखकर भरत के हृदय में अत्यंत प्रेम उमड़ आया।
English explanation
Beholding the beauty of Rama’s hill, Bharata’s heart filled with deep love.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| राम | राम का; राम से संबद्ध | Rama’s; associated with Rama |
| सैल | पर्वत | hill |
| सोभा | शोभा | beauty |
| निरखि | देखकर | beholding |
| भरत | भरत के; राम के भाई | of Bharata, Rama’s brother |
| हृदयँ | हृदय में | in the heart |
| अति | अत्यंत | very deep |
| पेमु | प्रेम | love |
2 तापस तप फलु पाइ जिमि सुखी सिरानें नेमु।।236।।
वे ऐसे सुखी हुए, जैसे कोई तपस्वी अपना नियम पूरा होने पर तप का फल पाकर सुखी होता है।
English explanation
He was happy like an ascetic who receives the fruit of austerity upon completing his vow.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तापस | तपस्वी | an ascetic |
| तप | तपस्या का | of austerity |
| फलु | फल | fruit; reward |
| पाइ | पाकर | having obtained |
| जिमि | जैसे | as; like |
| सुखी | सुखी होता है | is happy |
| सिरानें | पूरा होने पर | upon completion |
| नेमु | नियम या व्रत | observance or vow |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 236
- स्रोत अभिलेख
- 2.236
- सहायक विषय
- भरतजीका मन्दाकिनी-स्नान, चित्रकूटमें पहुँचना, भरतादि सबका परस्पर मिलाप, पिताका शोक और श्राद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 540, 540
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