अयोध्याकाण्ड · दोहा 235 · दोहा/सोरठा
जीति मोह महिपालु दल सहित बिबेक भुआलु।
जीति मोह महिपालु दल सहित बिबेक भुआलु।
करत अकंटक राजु पुरँ सुख संपदा सुकालु।।235।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.235 · पुस्तक पृ. 539, 540
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1जीति मोह महिपालु दल सहित बिबेक भुआलु।
विवेक रूपी राजा, मोह रूपी राजा को उसकी सेना सहित जीतकर—
English explanation
King Discernment, having defeated King Delusion together with his army—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जीति | जीतकर | having defeated |
| मोह | मोह रूपी | personifying delusion |
| महिपालु | राजा को | the king |
| दल | सेना | army |
| सहित | सहित | together with |
| बिबेक | विवेक रूपी | personifying discernment |
| भुआलु | राजा | the sovereign |
2 करत अकंटक राजु पुरँ सुख संपदा सुकालु।।235।।
निर्बाध राज्य करता है; नगर में सुख, संपत्ति और सुकाल है।
English explanation
Rules without opposition; in the city there are happiness, prosperity, and plentiful times.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| करत | करता है | exercises |
| अकंटक | बाधा और शत्रु से रहित | free of obstacles and enemies |
| राजु | राज्य-शासन | sovereign rule |
| पुरँ | नगर में | in the city |
| सुख | सुख | happiness |
| संपदा | समृद्धि | prosperity |
| सुकालु | अन्न-समृद्धि का अच्छा समय | a time of plenty |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 235
- स्रोत अभिलेख
- 2.235
- सहायक विषय
- भरतजीका मन्दाकिनी-स्नान, चित्रकूटमें पहुँचना, भरतादि सबका परस्पर मिलाप, पिताका शोक और श्राद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 539, 540
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।