अयोध्याकाण्ड · दोहा 234 · दोहा/सोरठा
लगे होन मंगल सगुन सुनि गुनि कहत निषादु।
लगे होन मंगल सगुन सुनि गुनि कहत निषादु।
मिटिहि सोचु होइहि हरषु पुनि परिनाम बिषादु।।234।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.234 · पुस्तक पृ. 538, 539
भावार्थ और शब्दार्थ
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1लगे होन मंगल सगुन सुनि गुनि कहत निषादु।
शुभ शकुन होने लगे। उन्हें सुनकर और विचारकर निषादराज कहने लगे:
English explanation
Auspicious omens began to appear. Hearing and considering them, the Nishada chief said:
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| लगे | लगे | began |
| होन | होने | to occur |
| मंगल | शुभ | auspicious |
| सगुन | शकुन | omens |
| सुनि | सुनकर | hearing |
| गुनि | विचारकर | considering |
| कहत | कहने लगे | said |
| निषादु | निषादराज गुह | Guha, the Nishada chief |
2 मिटिहि सोचु होइहि हरषु पुनि परिनाम बिषादु।।234।।
चिंता मिटेगी और आनंद होगा, किंतु फिर अंत में विषाद होगा।
English explanation
Anxiety will vanish and joy will arise, but afterward the outcome will be sorrow.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मिटिहि | मिट जाएगी | will vanish |
| सोचु | चिंता; शोक | anxiety; sorrow |
| होइहि | होगा | will arise |
| हरषु | आनंद | joy |
| पुनि | फिर | afterward |
| परिनाम | अंत में; परिणाम में | in the outcome |
| बिषादु | विषाद; दुःख | sorrow |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 234
- स्रोत अभिलेख
- 2.234
- सहायक विषय
- भरतजीका मन्दाकिनी-स्नान, चित्रकूटमें पहुँचना, भरतादि सबका परस्पर मिलाप, पिताका शोक और श्राद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 538, 539
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