अयोध्याकाण्ड · दोहा 233 · दोहा/सोरठा
मातु मते महुँ मानि मोहि जो कछु करहिं सो थोर।
मातु मते महुँ मानि मोहि जो कछु करहिं सो थोर।
अघ अवगुन छमि आदरहिं समुझि आपनी ओर।।233।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.233 · पुस्तक पृ. 537, 538
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1मातु मते महुँ मानि मोहि जो कछु करहिं सो थोर।
मुझे माता की योजना में सम्मिलित मानकर वे जो कुछ भी करें, वह कम ही होगा।
English explanation
If they regard me as a party to my mother’s scheme, whatever they do to me would be little enough.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मातु | माता कैकेयी की | of my mother Kaikeyi |
| मते | योजना; मंशा | scheme; intention |
| महुँ | में | in |
| मानि | मानकर | regarding |
| मोहि | मुझे | me |
| जो | जो | whatever |
| कछु | कुछ भी | anything |
| करहिं | वे करें | they may do |
| सो | वह | that |
| थोर | कम ही | little enough |
2 अघ अवगुन छमि आदरहिं समुझि आपनी ओर।।233।।
पर वे अपने स्वभाव का विचार करके मेरे पाप और अवगुण क्षमा कर मुझे आदर देंगे।
English explanation
Yet, mindful of their own nature, they will forgive my sins and faults and receive me with honor.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अघ | पाप | sins |
| अवगुन | दोष; अवगुण | faults; shortcomings |
| छमि | क्षमा करके | having forgiven |
| आदरहिं | आदर देंगे | will honor; will receive respectfully |
| समुझि | विचार करके | considering |
| आपनी | अपनी | their own |
| ओर | ओर; अपना स्वभाव | side; own disposition |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 233
- स्रोत अभिलेख
- 2.233
- सहायक विषय
- भरतजीका मन्दाकिनी-स्नान, चित्रकूटमें पहुँचना, भरतादि सबका परस्पर मिलाप, पिताका शोक और श्राद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 537, 538
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