अयोध्याकाण्ड · दोहा 66 · दोहा/सोरठा
राखिअ अवध जो अवधि लगि रहत न जनिअहिं प्रान।
राखिअ अवध जो अवधि लगि रहत न जनिअहिं प्रान।
दीनबंधु संदर सुखद सील सनेह निधान।।66।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.66 · पुस्तक पृ. 398, 398
भावार्थ और शब्दार्थ
1राखिअ अवध जो अवधि लगि रहत न जनिअहिं प्रान।
यदि मुझे अयोध्या में रखेंगे, तो वनवास की अवधि पूरी होने तक मेरे प्राण रहेंगे या नहीं, यह नहीं कहा जा सकता।
English explanation
If you leave me in Ayodhya, there is no knowing whether I shall remain alive until the exile ends.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| राखिअ | रखिए; रहने दीजिए | keep; leave |
| अवध | अयोध्या में | in Ayodhya |
| जो | यदि | if |
| अवधि | वनवास की नियत अवधि | the appointed term of exile |
| लगि | तक | until |
| रहत | रहेंगे; बने रहेंगे | will remain; survive |
| न | नहीं | not |
| जनिअहिं | जाना जा सकता | can be known |
| प्रान | मेरे प्राण; मेरा जीवन | my life; vital breath |
2 दीनबंधु संदर सुखद सील सनेह निधान।।66।।
हे दीनों के बंधु, सुंदर, सुख देने वाले तथा शील और स्नेह के भंडार!
English explanation
O friend of the distressed, beautiful giver of happiness, treasure of gracious character and affection!
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| दीनबंधु | हे दीन-दुखियों के बंधु | O friend of the distressed |
| संदर | सुंदर | beautiful |
| सुखद | सुख देने वाले | giver of happiness |
| सील | शील; सौम्य सदाचार | gracious character; good conduct |
| सनेह | प्रेम; स्नेह | love; affection |
| निधान | हे भंडार | O treasure; repository |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 66
- स्रोत अभिलेख
- 2.66
- सहायक विषय
- श्रीसीता-राम-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 398, 398
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