अयोध्याकाण्ड · दोहा 65 · दोहा/सोरठा
खग मृग परिजन नगरु बनु बलकल बिमल दुकूल।
खग मृग परिजन नगरु बनु बलकल बिमल दुकूल।
नाथ साथ सुरसदन सम परनसाल सुख मूल।।65।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.65 · पुस्तक पृ. 397, 398
भावार्थ और शब्दार्थ
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1खग मृग परिजन नगरु बनु बलकल बिमल दुकूल।
पक्षी और वन्य पशु परिजन होंगे, वन नगर होगा और वल्कल निर्मल रेशमी वस्त्र होंगे।
English explanation
Birds and wild animals will be family, the forest a city, and bark garments fine, spotless silk.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| खग | पक्षी | birds |
| मृग | वन्य पशु | wild animals |
| परिजन | परिवार के लोग | family members |
| नगरु | नगर | city |
| बनु | वन | forest |
| बलकल | पेड़ की छाल के वस्त्र | bark garments |
| बिमल | निर्मल | spotless |
| दुकूल | महीन रेशमी वस्त्र | fine silk garments |
2 नाथ साथ सुरसदन सम परनसाल सुख मूल।।65।।
हे नाथ, आपके साथ पत्तों की कुटिया देवताओं के भवन जैसी और सुख का मूल होगी।
English explanation
My lord, with you, a leaf hut will be like a heavenly dwelling and a source of happiness.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नाथ | हे नाथ | my lord |
| साथ | आपके साथ | with you |
| सुरसदन | देवताओं का भवन | a dwelling of the gods |
| सम | के समान | like |
| परनसाल | पत्तों की कुटिया | a leaf hut |
| सुख | सुख का | of happiness |
| मूल | मूल; स्रोत | source; root |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 65
- स्रोत अभिलेख
- 2.65
- सहायक विषय
- श्रीसीता-राम-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 397, 398
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