अयोध्याकाण्ड · दोहा 315 · दोहा/सोरठा
मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक।
मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक।
पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक।।315।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.315 · पुस्तक पृ. 607, 608
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक।
मुखिया मुख के समान होना चाहिए, जो खाने-पीने के लिए अकेला होता है।
English explanation
A leader should be like the mouth, which alone receives food and drink.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मुखिआ | मुखिया; प्रधान | leader; head |
| मुखु | मुख; मुँह | mouth |
| सो | के समान | like |
| चाहिऐ | होना चाहिए | should be |
| खान | खाने | eating |
| पान | पीने | drinking |
| कहुँ | के लिए | for |
| एक | एक; अकेला | one; alone |
2 पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक।।315।।
तुलसी कहते हैं: वह विवेकपूर्वक सभी अंगों का पालन-पोषण करता है।
English explanation
Tulsidas says: it sustains and nourishes all the limbs with discernment.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पालइ | पालन करता है | sustains |
| पोषइ | पोषण करता है | nourishes |
| सकल | सभी | all |
| अँग | अंगों को | the limbs |
| तुलसी | कवि तुलसीदास कहते हैं | says the poet Tulsidas |
| सहित | के साथ | with |
| बिबेक | विवेक; उचित समझ | discernment; sound judgment |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 315
- स्रोत अभिलेख
- 2.315
- सहायक विषय
- श्रीराम-भरत-संवाद,पादुका-प्रदान, भरतजीकी विदाई
- मुद्रित पृष्ठ
- 607, 608
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