अयोध्याकाण्ड · दोहा 314 · दोहा/सोरठा
दीनबंधु सुनि बंधु के बचन दीन छलहीन।
दीनबंधु सुनि बंधु के बचन दीन छलहीन।
देस काल अवसर सरिस बोले रामु प्रबीन।।314।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.314 · पुस्तक पृ. 606, 607
भावार्थ और शब्दार्थ
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1दीनबंधु सुनि बंधु के बचन दीन छलहीन।
दीनों के बंधु राम ने अपने भाई के विनम्र, छलरहित वचन सुनकर—
English explanation
Rama, friend of the distressed, having heard his brother's humble, guileless words—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| दीनबंधु | दीनों के हितैषी राम | Rama, friend of the distressed |
| सुनि | सुनकर | having heard |
| बंधु | भाई भरत | his brother Bharata |
| के | के | of |
| बचन | वचन | words |
| दीन | विनम्र, दीनतापूर्ण | humble |
| छलहीन | छल से रहित | guileless |
2 देस काल अवसर सरिस बोले रामु प्रबीन।।314।।
—विवेकशील राम स्थान, समय और अवसर के अनुरूप बोले।
English explanation
—the discerning Rama spoke appropriately to the place, time, and occasion.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| देस | स्थान | place |
| काल | समय | time |
| अवसर | अवसर, परिस्थिति | occasion, circumstances |
| सरिस | अनुरूप | in keeping with |
| बोले | बोले | spoke |
| रामु | श्रीराम | Rama |
| प्रबीन | विवेकशील, निपुण | discerning, skilled |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 314
- स्रोत अभिलेख
- 2.314
- सहायक विषय
- श्रीराम-भरत-संवाद,पादुका-प्रदान, भरतजीकी विदाई
- मुद्रित पृष्ठ
- 606, 607
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