अयोध्याकाण्ड · दोहा 164 · दोहा/सोरठा
मातु भरत के बचन मृदु सुनि सुनि उठी सँभारि।।
मातु भरत के बचन मृदु सुनि सुनि उठी सँभारि।।
लिए उठाइ लगाइ उर लोचन मोचति बारि।।164।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.164 · पुस्तक पृ. 479, 480
भावार्थ और शब्दार्थ
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1मातु भरत के बचन मृदु सुनि सुनि उठी सँभारि।।
भरत के कोमल वचन बार-बार सुनकर माता कौसल्या अपने को सँभालकर उठीं।
English explanation
Hearing Bharata's gentle words repeatedly, Mother Kaushalya gathered herself and rose.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मातु | माता कौसल्या | Mother Kaushalya |
| भरत | भरत | Bharata |
| के | के | of |
| बचन | वचन | words |
| मृदु | कोमल | gentle |
| सुनि | सुनकर | hearing |
| सुनि | बार-बार सुनकर | hearing again |
| उठी | उठीं | rose |
| सँभारि | अपने को सँभालकर | having collected herself |
2 लिए उठाइ लगाइ उर लोचन मोचति बारि।।164।।
उन्होंने भरत को उठाकर हृदय से लगा लिया; उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे।
English explanation
She lifted Bharata and clasped him to her heart, tears flowing from her eyes.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| लिए | ले लिया | took him |
| उठाइ | उठाकर | having lifted him |
| लगाइ | लगाकर | having clasped him |
| उर | हृदय से | to her heart |
| लोचन | आँखें | eyes |
| मोचति | छोड़तीं, बहातीं | shedding |
| बारि | जल, आँसू | water, tears |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 164
- स्रोत अभिलेख
- 2.164
- सहायक विषय
- भरत-कौसल्या-संवाद और दशरथजीकी अन्त्येष्टि क्रिया
- मुद्रित पृष्ठ
- 479, 480
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