अयोध्याकाण्ड · दोहा 165 · दोहा/सोरठा
पितु आयस भूषन बसन तात तजे रघुबीर।
पितु आयस भूषन बसन तात तजे रघुबीर।
बिसमउ हरषु न हृदयँ कछु पहिरे बलकल चीर। 165।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.165 · पुस्तक पृ. 480, 481
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1पितु आयस भूषन बसन तात तजे रघुबीर।
‘बेटा, पिता की आज्ञा से रघुवीर राम ने आभूषण और वस्त्र त्याग दिए।’
English explanation
‘Dear son, at his father’s command, Rama, the hero of Raghu’s lineage, gave up his ornaments and garments.’
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पितु | पिता की | his father’s |
| आयस | आज्ञा से | at the command |
| भूषन | आभूषण | ornaments |
| बसन | वस्त्र | garments |
| तात | हे पुत्र | dear son |
| तजे | त्याग दिए | gave up |
| रघुबीर | रघुवंश के वीर राम ने | Rama, hero of Raghu’s lineage |
2 बिसमउ हरषु न हृदयँ कछु पहिरे बलकल चीर। 165।।
‘हृदय में तनिक भी विषाद या हर्ष नहीं था; उन्होंने वल्कल-वस्त्र पहन लिए।’
English explanation
‘With neither the slightest sorrow nor joy in his heart, he put on bark garments.’
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बिसमउ | विषाद; खेद | sorrow; dejection |
| हरषु | हर्ष | joy |
| न | नहीं | neither; not |
| हृदयँ | हृदय में | in his heart |
| कछु | कुछ भी; तनिक भी | any; even the slightest |
| पहिरे | पहन लिए | put on |
| बलकल | पेड़ की छाल के | made of tree bark |
| चीर | वस्त्र | garments |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 165
- स्रोत अभिलेख
- 2.165
- सहायक विषय
- भरत-कौसल्या-संवाद और दशरथजीकी अन्त्येष्टि क्रिया
- मुद्रित पृष्ठ
- 480, 481
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।