अयोध्याकाण्ड · दोहा 70 · दोहा/सोरठा
मातु पिता गुरु स्वामि सिख सिर धरि करहि सुभायँ।
मातु पिता गुरु स्वामि सिख सिर धरि करहि सुभायँ।
लहेउ लाभु तिन्ह जनम कर नतरु जनमु जग जायँ।।70।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.7 · पुस्तक पृ. 401, 402
भावार्थ और शब्दार्थ
1मातु पिता गुरु स्वामि सिख सिर धरि करहि सुभायँ।
‘जो माता, पिता, गुरु और स्वामी की सीख को आदरपूर्वक स्वीकार कर सहज भाव से उसका पालन करते हैं—’
English explanation
‘Those who respectfully accept the counsel of mother, father, teacher, and master, and willingly act upon it—’
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मातु | माता | mother |
| पिता | पिता | father |
| गुरु | गुरु | teacher |
| स्वामि | स्वामी | master |
| सिख | सीख, निर्देश | counsel and instruction |
| सिर | सिर पर | upon the head |
| धरि | धारण करके, आदर से स्वीकार करके | having placed and respectfully accepted |
| करहि | पालन करते हैं | carry out |
| सुभायँ | सहज सद्भाव से | willingly and sincerely |
2 लहेउ लाभु तिन्ह जनम कर नतरु जनमु जग जायँ।।70।।
‘उन्होंने अपने जन्म का लाभ पाया; अन्यथा संसार में जन्म व्यर्थ है।’
English explanation
‘They have fulfilled the purpose of their birth; otherwise, birth in this world is in vain.’
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| लहेउ | प्राप्त किया | obtained |
| लाभु | लाभ, सार्थकता | benefit and fulfillment |
| तिन्ह | उन्होंने | they |
| जनम | जन्म | birth |
| कर | का | of |
| नतरु | नहीं तो, अन्यथा | otherwise |
| जनमु | जन्म | birth |
| जग | संसार में | in the world |
| जायँ | व्यर्थ | in vain |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 70
- स्रोत अभिलेख
- 2.7
- सहायक विषय
- श्रीराम-कौसल्या-सीता-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 401, 402
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।