अयोध्याकाण्ड · दोहा 71 · दोहा/सोरठा
उतरु न आवत प्रेम बस गहे चरन अकुलाइ।
उतरु न आवत प्रेम बस गहे चरन अकुलाइ।
नाथ दासु मैं स्वामि तुम्ह तजहु त काह बसाइ।।71।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.71 · पुस्तक पृ. 402, 402
भावार्थ और शब्दार्थ
1उतरु न आवत प्रेम बस गहे चरन अकुलाइ।
प्रेम के वश में लक्ष्मण से उत्तर नहीं बन पड़ा; व्याकुल होकर उन्होंने राम के चरण पकड़ लिए।
English explanation
Overcome by love, Lakshmana could make no reply; in anguish, he clasped Rama’s feet.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| उतरु | उत्तर | a reply |
| न | नहीं | not |
| आवत | आता था; बन पड़ता था | could come forth |
| प्रेम | प्रेम के | of love |
| बस | वश में | under the sway |
| गहे | पकड़ लिए | clasped |
| चरन | राम के चरण | Rama’s feet |
| अकुलाइ | व्याकुल होकर | in anguish |
2 नाथ दासु मैं स्वामि तुम्ह तजहु त काह बसाइ।।71।।
हे नाथ, मैं सेवक हूँ और आप स्वामी हैं। यदि आप मुझे छोड़ दें, तो मेरा क्या वश चल सकता है?
English explanation
My lord, I am your servant and you are my master. If you abandon me, what power do I have to prevent it?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नाथ | हे नाथ | O lord |
| दासु | सेवक | a servant |
| मैं | मैं | I |
| स्वामि | स्वामी | the master |
| तुम्ह | आप | you |
| तजहु | छोड़ दें | should abandon me |
| त | तो | then |
| काह | क्या | what |
| बसाइ | वश; सामर्थ्य | power to intervene |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 71
- स्रोत अभिलेख
- 2.71
- सहायक विषय
- श्रीराम-लक्ष्मण-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 402, 402
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।