अयोध्याकाण्ड · दोहा 72 · दोहा/सोरठा
करुनासिंधु सुबंध के सुनि मृदु बचन बिनीत।
मूल पाठ
करुनासिंधु सुबंध के सुनि मृदु बचन बिनीत।
समुझाए उर लाइ प्रभु जानि सनेहँ सभीत।।72।।
स्रोत अभिलेख 2.72 · पुस्तक पृ. 403, 403
भावार्थ
मूल पाठ के बाददयाके समुद्र श्रीरामचन्द्रजीने भले भाईके कोमल और नम्रतायुक्त वचन सुनकर और उन्हें स्नेहके कारण डरे हुए जानकर, हृदयसे लगाकर समझाया॥ ७२॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 403 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1करुनासिंधु सुबंध के सुनि मृदु बचन बिनीत।
English explanation
Rama, the ocean of compassion, hearing his dear brother’s gentle and humble words—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| करुनासिंधु | करुणा के सागर राम | Rama, the ocean of compassion |
| सुबंध | प्रिय भाई लक्ष्मण | his dear brother Lakshmana |
| के | के | of; possessive marker |
| सुनि | सुनकर | having heard |
| मृदु | कोमल | gentle |
| बचन | वचन | words |
| बिनीत | विनम्र | humble |
2 समुझाए उर लाइ प्रभु जानि सनेहँ सभीत।।72।।
English explanation
Knowing that his brother was fearful because of his affection, the Lord embraced him and reassured him.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| समुझाए | समझाया; आश्वस्त किया | explained; reassured |
| उर | हृदय से; छाती से | to his heart; to his chest |
| लाइ | लगाकर | having drawn close |
| प्रभु | स्वामी राम ने | the Lord Rama |
| जानि | जानकर | knowing; recognizing |
| सनेहँ | स्नेह के कारण | because of affection |
| सभीत | भयभीत | fearful |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 72
- स्रोत अभिलेख
- 2.72
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 403
- सहायक विषय
- श्रीराम-लक्ष्मण-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 403, 403
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