अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
धरम नीति उपदेसिअ ताही। कीरति भूति सुगति प्रिय जाही।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दधर्म और नीतिका उपदेश तो उसको करना चाहिये जिसे कीॢत, विभूति (ऐश्वर्य) या सद्गति प्यारी हो। किन्तु जो मन, वचन और कर्मसे चरणोंमें ही प्रेम रखता हो, हे कृपासिन्धु! क्या वह भी त्यागनेके योग्य है?॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 403 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
धरम नीति उपदेसिअ ताही। कीरति भूति सुगति प्रिय जाही।।
मन क्रम बचन चरन रत होई। कृपासिंधु परिहरिअ कि सोई।।
स्रोत अभिलेख 2.72 · पुस्तक पृ. 403, 403
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 धरम नीति उपदेसिअ ताही। कीरति भूति सुगति प्रिय जाही।।
English explanation
Teach righteousness and proper conduct to one who cherishes fame, prosperity, and a blessed destiny hereafter.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| धरम | धर्म | righteousness; duty |
| नीति | नीति; उचित आचरण | proper conduct |
| उपदेसिअ | उपदेश दीजिए | please instruct |
| ताही | उसी को | to that person |
| कीरति | यश | fame; good reputation |
| भूति | ऐश्वर्य; समृद्धि | prosperity; worldly fortune |
| सुगति | शुभ परलोक-गति | a blessed destiny hereafter |
| प्रिय | प्रिय | dear; cherished |
| जाही | जिसे | to whom |
2 मन क्रम बचन चरन रत होई। कृपासिंधु परिहरिअ कि सोई।।
English explanation
O ocean of grace, should one who is devoted to your feet in thought, deed, and speech be abandoned?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मन | मन से | in thought |
| क्रम | कर्म से | in deed |
| बचन | वचन से | in speech |
| चरन | आपके चरणों में | to your feet |
| रत | अनुरक्त; समर्पित | devoted |
| होई | हो | is; may be |
| कृपासिंधु | हे कृपा के सागर | O ocean of grace |
| परिहरिअ | त्याग दिया जाए | should be abandoned |
| कि | क्या | should; whether |
| सोई | उसी को | that very person |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.72
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 403
- सहायक विषय
- श्रीराम-लक्ष्मण-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 403, 403
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