अयोध्याकाण्ड · चौपाई · चौपाई
जहँ लगि जगत सनेह सगाई। प्रीति प्रतीति निगम निजु गाई।।
मूल पाठ
जहँ लगि जगत सनेह सगाई। प्रीति प्रतीति निगम निजु गाई।।
मोरें सबइ एक तुम्ह स्वामी। दीनबंधु उर अंतरजामी।।
स्रोत अभिलेख 2.72 · पुस्तक पृ. 403, 403
भावार्थ
मूल पाठ के बादजगत्में जहाँतक स्नेहका सम्बन्ध, प्रेम और विश्वास है, जिनको स्वयं वेदने गाया है—हे स्वामी! हे दीनबन्धु! हे सबके हृदयके अंदरकी जाननेवाले! मेरे तो वे सब कुछ केवल आप ही हैं॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 403 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 जहँ लगि जगत सनेह सगाई। प्रीति प्रतीति निगम निजु गाई।।
English explanation
All the bonds of affection, love, and trust in the world, which the Vedas themselves describe—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जहँ | जहाँ; जितनी सीमा तक | where; to whatever extent |
| लगि | तक | up to |
| जगत | संसार में | in the world |
| सनेह | स्नेह | affection |
| सगाई | नाते; संबंध | relationships; ties |
| प्रीति | प्रेम | love |
| प्रतीति | विश्वास | trust |
| निगम | वेद | the Vedas |
| निजु | स्वयं | themselves |
| गाई | गाए; वर्णित किए | sang of; described |
2 मोरें सबइ एक तुम्ह स्वामी। दीनबंधु उर अंतरजामी।।
English explanation
Master, for me you alone embody all those relationships; you are the friend of the helpless and know the heart within.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मोरें | मेरे लिए | for me |
| सबइ | सभी | all |
| एक | अकेले; एक ही | alone; the one |
| तुम्ह | आप | you |
| स्वामी | हे स्वामी | O master |
| दीनबंधु | दीनों के बंधु | friend of the helpless |
| उर | हृदय के | of the heart |
| अंतरजामी | भीतर की बात जानने वाले | knower of what lies within |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 2.72
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 403
- सहायक विषय
- श्रीराम-लक्ष्मण-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 403, 403
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।