अयोध्याकाण्ड · दोहा 75 · दोहा/सोरठा
मातु चरन सिरु नाइ चले तुरत संकित हृदयँ।
मातु चरन सिरु नाइ चले तुरत संकित हृदयँ।
बागुर बिषम तोराइ मनहुँ भाग मृगु भाग बस।।75।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 2.75 · पुस्तक पृ. 405, 406
भावार्थ और शब्दार्थ
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1मातु चरन सिरु नाइ चले तुरत संकित हृदयँ।
माता के चरणों में सिर झुकाकर लक्ष्मण तुरंत चले, हृदय में आशंका लिए हुए।
English explanation
Bowing his head at his mother’s feet, Lakshmana left at once, with apprehension in his heart.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मातु | माता के | mother’s |
| चरन | चरणों में | at the feet |
| सिरु | सिर | head |
| नाइ | झुकाकर | having bowed |
| चले | चल पड़े | set out |
| तुरत | तुरंत | at once |
| संकित | आशंकित | apprehensive |
| हृदयँ | हृदय में | in the heart |
2 बागुर बिषम तोराइ मनहुँ भाग मृगु भाग बस।।75।।
मानो कोई हिरन सौभाग्यवश कठिन जाल तुड़ाकर भाग निकला हो।
English explanation
As though a deer had, through good fortune, broken free of a formidable snare and fled.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बागुर | जाल | snare |
| बिषम | कठिन; दुस्तर | formidable; hard to escape |
| तोराइ | तुड़ाकर; तोड़कर मुक्त होकर | having broken free |
| मनहुँ | मानो | as though |
| भाग | भाग निकला | fled |
| मृगु | हिरन | a deer |
| भाग | सौभाग्य | good fortune |
| बस | के कारण | through; owing to |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अयोध्याकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 75
- स्रोत अभिलेख
- 2.75
- सहायक विषय
- श्रीलक्ष्मण-सुमित्रा-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 405, 406
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